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Monday, May 7, 2012

मैँ मूसाफिर अकेला .............!!!

मैँ मूसाफिर अकेला मंज़िल ढूँढने चला था ,
जिस मंज़िल कि तलाश मेँ मैँ था वहा एक मुसाफिर और था,
एक आकांक्षा थी छूलूंगा आसमान 
पर आसमां भी परिँदो से घिरा हुआ था ,
मैँ ठहरा सहमा क्या करु,
एक मुसाफिर का हाथ सामने आया ,
मैँने पुछा क्या मंज़िल मिलना आसान है?
मुसाफिर ने बताया ,
उड़ना तो हर परिँदे का काम है ,
किस पंछी को कहा जाना है,
परेशानीया करती मजबूर है,
तू मूड़ कर ना देख अगर कुछ हाथ ना लगे,
एक दिन तू आसमाँ मेँ उड़ता हूँआ अपने आप को पायेगा और नीचे लोग तूझे उड़ता देख खुश हो जायेँगे :-)

देवेन्द्र गोरे ।

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